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Showing posts from 2017

दरिया खारी क्यूँ है ? FICTIONAL STORY OF FRIENDSHIP BETWEEN mountain and Rin chin

                                कहानी दरिया और दरिया की मौजे  - बच्चो से लेकर बड़ो तक सभी को खूब भाती हैं , दरिया की बातें की इसी की तरह गहरी और विस्तार वाली है जो किनारे से हमारी कल्पनाओं से भी परे होती हैं । दरिया-सच्ची , प्रामाणिक , किवदंती , कपोल काल्पनिक , रहस्यमयी   , जादू-टोना   , ऐतिहासिक व रोमांचकारी कहानियों से भी इतनी ही भरी है जितनी पानी से । दरिया कितनी पुरानी है , कितना पानी है इसमें , कितना गहरा और इनसे भी गहरा सवाल दरिया का पानी खारा क्यूँ है ? ये बात उतनी पुरानी है जब समय को मापने के  साधन भी नहीं बने थे न ही मानव को समझ थी की कभी इसकी जरूरत पड़ेगी । मानव आज की तरह सामाजिक कम था , जल –हवा – आकाश का आज की भांति बंटवारा नहीं हुआ था , भाषा भी अपने शैशव काल में ही थी । वो कहते हैं ना की  हमारी सारी आवाज़े कभी खत्म ही नहीं होती , ये तो हवा के साथ घूमती रहती हैं , ये अलग बात है की हम उन्हे सुन नहीं पाते अपने इंसान होने के कारण , पर इंसान है भी तो बला की चीज जो ख...

BEAUTY OF MATHS PASCAL TRIANGLE AMAZING PATTERNS BOOLEAN AND FIBONACCI

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from science class- how a candle burn,mombatti ka jalna -energy science pedagogy experiment

8वी के 8 बालको के साथ जसराज विज्ञान की कक्षा को शुरू कर रहा था , 9:30 हो चुके थे , कल उसने जीवाश्म ईधन के बारे में बताया था , उसे विज्ञान पढ़ाते हुए ये देखने की इच्छा हुई की वो क्या प्रयोग व चर्चा करता है , उसे बच्चों को बुलाने के लिए बाहर जाना पड़ा , 4 बच्चों के साथ मैंने ऊष्मा व ऊर्जा पर बात शुरू की , ऊष्मा शब्द से क्या खबर पड़ती है ? आग , गर्मी , ताप –एक –एक शब्द में बच्चों ने जबाब दिये और ऊर्जा –ये क्या है ? मैंने पूछा गर्मी ..... एक बोला – भोजन हाँ , भोजन से हमें ऊर्जा मिलती है , मैंने बोलना शुरू ही किया था ही की मेरी बात को काटते हुए एक बच्चा बोला – प्रोटीन से हमें ऊर्जा मिलती है , भोजन से नथी मैंने उसकी बात का समर्थन करते हुए कहा की हमारे शरीर को , हमें कुछ भी काम करने के लिए ऊर्जा चाहिय , जिसके लिए हम भोजन करते हैं , जो प्रोटीन , वसा  और कई तरह की ऊर्जा देता है , हमें ये ऊर्जा सीधे किसी चीज से नहीं मिलती है , इसलिए हमें खाना लेना पड़ता है जो इन सबमें –प्रोटीन बगेरह में टूटकर हमें ऊर्जा देता है जिससे हम सारे काम कर पाते हैं , इतने में जसराज भी हमारी...

मुझे गुंडा बनना है !

                                   मुझे गुंडा बनना है ! एक दौर था जब फिल्मों के विलेन बेढब शरीर वाले , भारी –भरकम , कटी –फटी शक्ल वाले डरावने होते थे , मेक अप करने वालों को भी कोई मसक्कत नहीं करनी होती होगी । एक बार गौर फरमाते हैं इस सूची पर – अमजद खान – गब्बर , अमरीश पूरी – मोगेम्बो , रंजीत , प्रलय नाथ गुंडा स्वामी ऐसे ही कुछ नाम जेहन में आए पहली बार विचारने में , और रही सही कसर उनकी पौशाक पूरी कर देती थी , उनके चमचे भी ऐसे ही डील –डॉल वाले होते थे । उनके गेट –उप व डाइलॉग बोलने के अंदाज से ही अनायास ही खबर पड़ जाती कि वो ही गुंडे हैं । उस दौर में भी समाज में जो गुंडे होते होंगे , क्या ये ही स्वरूप होगा ? फिर समय के साथ जो बड़ा बदलाव आया है कि अब गुंडे चाकलेटी कहे जाने वाले चेहरे में आने लगे और लोगों के दिलों पर राज भी कर रहें हैं – डॉन व रईस में शाहरुख , खाकी में अजय देवगन , गुंडे में रणवीर व अर्जुन , वैल्कम बेक में जॉन अब्राहम व अनिल कपूर …… पहले से ज्यादा नाम जेहन में...

स्कूल को स्वच्छ रखना होगा एवं डब्बा ढ़ोल आंदोलन

           स्कूल   को स्वच्छ रखना होगा एवं डब्बा ढ़ोल आंदोलन बच्चो की स्वतत्र सत्ता को हमारा समाज हमेशा से नकारता रहा है , बच्चो को हमेशा रोक –टोक , दिशा –निर्देशों के साथ ही समाज ने स्वीकारा है , उनके स्वतंत्र चिंतन , रचनात्मक रवेये , स्वायत्ता को लेकर बड़ो व तथाकथित समझदार लोगों ने सदैव संदेह से ही देखा है । वहीं दूसरी और अपने कौशल , जिज्ञासु प्रवत्ति , अद्भूत साहस  से बच्चो ने समाज को हमेशा आश्चर्य में डाला है – अभी हाल के ही डब्बा ढ़ोल आंदोलन ने इसे साबित भी कर दिया है । एक ओर जहां स्वच्छ भारत अभियान में देश सभी लोग गंदी राजनीति में लगे हुए हैं , वही मध्य प्रेद्रेश के बच्चों ने खुले में शोच के खिलाफ़ डब्बा ढ़ोल आंदोलन से समाज को आईना दिखाने का काम किया है । हम बच्चे इस आंदोलन को आगे कैसे ले जायेँ जिससे समाज में व्याप्त अंधेरे में आशा की किरण प्रकाशित रहे । स्कूल जहां हम अपने बचपन का अधिकतर समय बिताते हैं , जो हमारे भविष्य की आधारशिला रख रहा होता है , उसकी स्वच्छता मंदिर की स्वच्छता से भी बढ़कर है । देश भर के स्वच्छता अभियान चाहे जि...

मेरी विज्ञान की कक्षा my science class

                              मेरी विज्ञान की कक्षा “ हमारा सबसे अनोखा अनुभव रहस्यमय होता है । यही मूल भावना सच्ची कला और सच्चे विज्ञान की बुनियाद है । जो इंसान इस बात से अनजान है , जो न आश्चर्यचकित हो सकता है और न ही अपना कौतूहल प्रकट कर सकता है , उसकी आंखे मूँद गयी हैं , वह लगभग मर चुका है ।“                                                                -अल्बर्ट आइंस्टीन मानव होने के मायने के जो मूल में है – अपने परिवेश में हो रही घटनाओं का अवलोकन कर उनसे अन्त: क्रिया करना , अपनी जिज्ञासाओं को तलाशना और उसमें आनंद की अनुभूति करना । रोज़मर्रा के जीवन में घटने वाली बातों पर अक्सर हम सोचना बंद कर दे...

Tinker lab creating science resource centre doing science

                                Jamnagar tinkering space Objective- Create science resource center at DIET, Jamnagar Resource person- Ravi and Neeraj from CLI, Gandhinagar Other participants- Vijay suriliya (From Jamnagar, DIET), Vikas, Gorang and Ujjwal (from CSPC-TATA) and B.Ed students Date- 5 September 2017 to 8 September 2017 “हमारा सबसे अनोखा अनुभव रहस्यमय होता है । यही मूल भावना सच्ची कला और सच्चे विज्ञान की बुनियाद है । जो इंसान इस बात से अनजान है, जो न आश्चर्यचकित हो सकता है और न ही अपना कौतूहल प्रकट कर सकता है , उसकी आंखे मूँद गयी हैं , वह लगभग मर चुका है ।“                                                                -अल्बर्ट आइंस्टीन Background- The education project under Coastal Salinity Prevention Cell (an associate organiz...

कुछ खेल करूँ ,कुछ विज्ञान करूँ । SCIENCE CLASS, SCIENCE PEDAGOGY, POEM ON DOING SCIENCE

जहां जाने से प्रश्न उमड़ना शुरू कर दे , अब जब देखूँ तो कुछ खोजता हुआ देखूँ , कुछ कल्पनाएं गढ़ता हुआ , कुछ प्रयोगो से गुज़रूँ आस –पास की चीजों को बाँट दूँ उनकी प्रकीर्ति , गुणो जैसे आधारों में , पहचानु उनमे छिपे पैटर्नस को , कुछ तर्क करूँ , कुछ पूर्वानुमान करूँ , कुछ अपने से सिद्धांत गढ़ू , जो विभिन्न विषयों से जाना है उन्हे जोड़कर कुछ संवाद करूँ , कुछ बातों को छोडु मैं , कुछ नयी बातों को जोड़ू मैं , एक ढांचे में विचार गढ़ू , उनको दर्ज करूँ , फिर नए सवाल करूँ , फिर नए सिरे से संवाद करूँ रोज़मर्रा के छोटे –बड़े सवालों से यहाँ जूझूँ मैं , उनके जबाब तलाश करूँ , फंसी पड़ी मानवता जिन जंजालों में कुछ तो उनको खोलूँ में , कुछ तो जालें दूर करूँ , इस जगह से विज्ञान में जीने की शुरुआत करूँ , कुछ खेल करूँ , कुछ विज्ञान करूँ ।

EDUCATION : एक अलग चश्मे से

             As atmosphere consist of many layers e.g.-ionosphere, stratosphere, exosphere etc. same as education imbibes many layers e.g. – philosophy, definitions, knowledge etc. As human with the time adopted to atmosphere. Is not same for education? We adopted with time and feel danger of our existence in the absence of education like atmosphere.     जब जरूरते लालच न थी , हमारी इच्छाएं बौनी थी , धरती के संशाधन ज्यादा थे , हमारे झगड़े सच्चे थे , हमारी दोस्ती पक्की थी , हाँ , वो एक दौर था , जब हम मानव ज्यादा थे , हमसे छीन लिए हमारे विचार , दे दिये नए सपने , प्रतिस्पर्धा ने छीन लिए हमारे सारे रिश्ते , क्यूँ एक दिमाग में उपजी अवधारणा को हमने सब पर थोप दिया ? रीति-रिवाज , परंपरा , सभ्यता ........  और न जाने क्या –क्या इन नामों को तो जिंदा रखना जरूरी समझा , पर इनकी कीमत में मानवता को ही दे डाला , समाज ने इसको रचा , या इसने समाज को इसने बना डाला , ...