SCIENCE PEDAGOGY 2

गिलास में क्या है ?
खाली है ,
कितने खाली बता रहे हैं
?
कुछ सोचने लगते हैं ,
हवा है ! एक दो बोलते हैं
हवा कैसे?
चुप्पी सी कक्षा में ........
ये तो हमने किया था ,याद करो
हाँ , गिलास को उल्टा पानी मे डुबोकर तिरछा करो,
(ज्यादा बच्चो की आवाज) बुलबुले निकलते हैं ....
.......
लेजर का आखिरी बिन्दू ही दिखता है ,
बीच की लाइट कैसे देखे
?
डेटोल की शीशी में था थोड़ा सा कुछ ,
आधे में पानी मिला दिया ,
और आधी बची शीशी में अगरबत्ती का धुआँ भर दिया ,
धुआँ वाले भाग पर लेजर डालने पर,
शीशी में लाइट दिखी ,
जो सीधी रेखा में जा रही थी
,
गिलास में पानी लिया ,
पेंसिल टेढ़ी दिखाई दी ,
समतल काँच का गुटका लिया
,
एक सिरे से तिरछे लेजर से लाइट डाली,
एक पेपर पर डाली गयी किरण
,समतल से पार निकली किरण को खींचा ,
दोनों एक सीध में नहीं थी ......
सभी ने समूह में बारी –बारी खुद भी किया
यही तो है प्रकाश का अपवर्तन ।
प्रिज्म से भी इंद्रधनुष बनाया ,
कक्षा में , कक्षा के बाहर ,
धूप में ,छाव में ,
दीवार पर ,कापी पर ......
कोण भी नापे ...
पहले वाला आपतन ,
दूसरे वाला अपवर्तन ......
ऐसे ही सरलता से सरस वार्तालाप से बच्चे विज्ञान को जी रहे थे , खुद से बाते  कर रहे थे , एक दूसरे से पूछ रहे थे, एक दूसरे की मदद कर रहे थे , संदर्भ व्यक्ति से भी बातचीत (थोड़ी कम ) कर रहे थे। संदर्भ व्यक्ति की अच्छी तैयारी, विषय की अच्छी समझ , सीखने के प्रवाह मे दखल ना करने से 47 बच्चो की जीवंत कक्षा चल रही थी।
यह एक आश्रम शाला की कक्षा थी
, जहां अभी हाल में ही आर्च ने कार्य शुरू किया है। संवाद बच्चो को प्रश्नो के लिए उकसा रहा था , उन्हे जबाब की ओर इशारा करके रुक जा रहा था , जाना तो जबाब तक खुद ही पड़ रहा था हर एक को । जिनको जबाब मिल रहा था वो दूसरे को बता रहे थे , दूसरे से जबाब पाने पर ,खुद भी उसे करके देख रहे थे।
बच्चे खुले जेहन से अवलोकन कर रहे थे , कुछ कल्पना पिरो रहे थे , करके देख रहे थे , प्रश्नो को बदल रहे थे , खुद ही जबाब देकर , जबाब को तोल रहे थे , पहले जबाब मिलते ही नए सवाल मिल जा रहे थे, सुबह 10 बजे से शाम को 4:45 तक अनवरत यह सिलसिला चल रहा था। ( एक घंटे का भोजन अवकाश था )।
विज्ञान की सभी अवधारनाओं को कुछ ऐसे ही सीखने सिखाने के दौर से गुजारने के उद्देश्य को लेकर एक केंद्र बनाने की योजना है, वो क्या प्रोयोग होंगे, उनके लिए जरूरी सामग्री , इन पर पुख्ता समझ बनाने के लिए संदर्भ सामग्री ,इसी केंद्र की परिकल्पना के इर्द –गिर्द दो दिनो  तक में सवाल –दर – सवाल करता जा रहा था , पूरी तन्मयता से मुझे सुना गया , मुझे दिशा दी गई , अपने अनुभवो को मुझसे साझा किया गया । कुछ E- सामग्री भी जमा कर ली है ,एकलव्य की बाल वैज्ञानिक और अन्य कुछ पुस्तके ले ली है, जो मेरे प्रयास में मदद कर रही होंगी , और विज्ञान कोई तालाब थोड़े ना है , ये तो सतत प्रवाह है , इसके साथ तो बहना ही होगा , जैसे जैसे आगे बढ़ते जाएंगे ,नयी दिशा पर चलकर , रुककर ,मुड़कर .....चलते जायेंगे तो मंजिल पर पहुँच ही जायेंगे ,इस बात को ध्यान रखते हुए – साँझ होने से पहले।


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